01---The Gita -Made Simple ;An Understanding through Hindi Poem--E-Book
“जब भी देश / समाज मे समस्या आती हैं तब कहीं न समाज गुरुजनो के उपर निर्भर हो जाता है, तभी तो दोष भी गुरुजनो को मिल् ता है, बात भी सही हैं जिस दिन गुरुजी ने चाह लिया, देश व समाज की तसबीर व तक़्द्दीर बदल जायेगी I-------सहमत------
०२ गुरु जनो काउदाहरण आपके सामने है------गुरु द्रोणाचार्य--पांडव व कौरवॊ के गुरुजन---शिक्षा ऐसी दी, : महाभारत करा दिया—high class education—convent based------------
गुरु संदीपन---- कृष्णा
व सुदामा
के गुरुजन--- शिक्षा ऐसी दी ----to all
like our primary and govt and aided/recognized schools--राजा ने मित्र के लिये राज् ही छोड़ दिया ””
हमस़ब शिक्षक(formal or informal.as we teach everday ) हैं
आंओ कृष्णा सें सीखें -----
-गीता
JEEVA PATH पाठ-----
“ पैदल चलती सेना,
घुड़सवार थे चहुँ ओर I
रथो पे बैठे महायोद्धा,
बढ़ते हाथी मचाते शोर II1II
भयाक्रान्त थे लोग सभी
बैठा-2 दिल भी था I
कल क्या होंगा ;सोच सभी,
दुःखी्-2 सा मिल् ता था II2II
द्रश्य विहग़म ? शोर अजीब ?
लहू की प्यासी सेना थी I
दो इंच जमीं की खातिर,
आमने ,सामने सेना थीII3II
विश्वास ,भरोसा सत्य ,न्याय
दाब पे लगे, सभी सुकर्म I
ताज मिलेगा इनको,
या विजयी होaगे सभी कुकर्म II4II
ताल मेल असम्भव है,
सत्य झूठ के बीच की खाई I
कटती लाशों को देखा,
सदियों से ये चली लड़ाईII5II
आज दौर ये फिर आया,
अंहकार ने साथ दिया,I
झूठ ने ठोका दावा अपना ,
जड़े सभी की हिला दिया II6II
एक तरफ़ दुर्योधन, दुःशासन
सेना उनकी विशाल ,श्रेष्ठ I
अश्वथामा ,कर्ण सरीखे,
सङ्ग थे पितामह कुल ज्येष्ठ II7II
अप्नौ को देखा खून पिपासु,
अर्जुन का मन् डोल गया I
नही चाहिए राज सिंहासन ,
दिल भी उस् का बोल
गया II8II
घबराकर, सिर पीटे, रोकर,
अर्जुन होता गया अधीर I
उपाय
ना सुझा उस् को कोई,
तर्कश
मे रख दिये तीर II9II
अप् नौ की लाशो पे राज महल,
नही चाहिए, अर्जुन बोला I
डर के मारे कॉंप उठा,
दिल बैठा, मन उस् का डोला II10II
अर्न्तमन का अर्न्तद्वन्द्ध ,
रहा नतीजा सिफर, शून्य I
अपने मुझको जान से प्यारे ,
परन्तु (उसक चेतना करती शून्य I11I
माधव ने अर्जुन को देखा,
मुस्काते मुस्काते -सुना सभी I
अर्जुन होगें इस हाल में,
देखे माधव नहीं कभी I12I
बार- बार प्रश्नों की बारिश
घबराये अर्जुन करते I
क्यों, क्या, किसको, कैसे ,
कहते-हुये कभी न थकते I13I
माधव ने दी खुली छूट,
अर्जुन तुम निशंक कहो I
शेष बचे न प्रश्न कोई,
जब तकमन करता उसको कहो I14I
अर्जुन भोलाभाला इंशा,
जानना पाता जीवन का मर्म
दूर परिधि से सोच समझ के ,
करता रहता अपना कर्म II15II
है मनुष्य की कमजोरी ये
धन वैभव उसका मकसद,
दिन रात लगा रहता है वो
नहीं समझता अपनी हद II16II
ये मेरा है ये तेरा है,
जीवन कहता यही कहानी ,
इक हवा का झोका है ये,
आ जाती है नींद सुहानी II17II
आपाधापी,मारकाट, अर्जुन !
नियम बनाता अपनी खातिर,
सत्य मिटाना उसकी फितरत ,
बन ता स्वयं ही शातिर II18II
(Unable to bear with
truth
and hence goes astray)
दुनिया के इस रंगमच को,
निर्देशन देता भगवान I
जबतक ऊपर वाला चाहे
कर्म निभाता है इंशान I19I
सहने की ताकत की सीमा,
नियम शाश्वत चलता है I
झूठ कभी ना पनप सका,
सत्य सदा संग चलता है I20I
माया मोह की गजब दास्तां ,
इस भ्रम में है में दुनिया सारी ,
मेरा है ,ये मेरा है बस ,
मची इसी की मारामारी I21I
झूठ हार जाता है हरदम
जीत सत्य की सदा रही,
सदियों से हम सुनते आये
यही दास्तां सबने कही I22I
माधव ही जाने मेरी व्यथा,
अर्जुन कहते बार -2,
मुझे यहाँ से जाने दो,
होने दो सपने तार-तार I23I
अध्याय समाप्त
जय हो कृष्णा
Note-The work is original ,other than Google and Facebook nowhere,it is published
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