2---The Gita -A Message to Humanity in A Simple Hindi Poetry-E-Book


प्रिय साथियो/मित्रों
अभी तक गीता की पृष्ठ भूमि का सरल प्रस्तुतीकरण था
आपके सहयोग के लिए धन्यवाद I
अब द्धितीय अध्याय से शुरू करते हैं
गलती के लिए पहले से ही मॉफी निवेदित है
इस दुरूह कार्य में आपका सहयोग एवं मार्गदर्शन भी निवेदित है------
द्वितीय अध्याय--
समर्पित है--मीठी - यादो के लिये----
माँताजी , भाई डा० राजीव कुमार सिंह,भाई-पत्नी गुडिया,मित्र-एस० के सिह्-
(and all those known or unknown (Who left for heaven with sweet memories left behind, May Lord Krishna let their soul rest in peace with heavenly bliss!)

कौन हो तुम ! पार्थ,
क्या कभी स्वयं को समझा,
जीवन मिला है जीने को,
क्या यही अभी तक बूझा I24I
Who are you,Parth,
Did you know thyself,
Life is to live,
Understood thyself.

कर्त्ता नहीं हो जगत के तुम !,
जो चाहो कर सकते,
निमित्त मात्र उस कर्त्ता के,
वो चाहे तबतक हम जीते I25I
You are not the doer of the World,
As wished and did,
Only a sign of that Doer,
This is the Truth candid
सत्य मार्ग है दुर्गम भारी ,
सत्य विश्व का है आधार ,
सत्य मार्ग पे चलना तुमको ,
यही है जीवन का सार I26I
The path to Truth is difficult,
But Truth is basis of the world,
To follow this path,
Is the essence of life in the world,


लोग करोड़ों मरते प्रतिदिन,
जन्म पुनः वे पाते हैं
हजार साल का इन्तजार,
योद्धा तुम जैसे आते हैं I27I
Thousand die everyday,
And reborn are they,
Wait of thousand years,
Warrior like you find the way
धर्म अधर्म का महायुद्ध ,
जीत धर्म की होनी है,
धर्म की रक्षा तुमको करनी ,
लिखा यही, अब होनी है I28I

जब-2 अत्याचार बढ़े,
अधर्म ने जगह बनाई अपनी ,
दाता  भेजा योद्धा तुम जैसे ,
मिटा अधर्म जगह बना अपनी I29I

माया मोह के इस जगत में,

ने तेरा कोई, न तुझ से बनता है,

क्षण भंगुर जीवन में तू,

क्यों इठलाता फिरता है I30I

आज जो तेरे हैं !

भ्रम तूने पाल रखा,

कल को  दूर-2 तक,

ना बनेगा तेरा कोई सखा I31I

वे भी चाहें तब भी,

कुछ कर नहीं सकते ,

सदा  को इस दुनिया में,

वे भी जुड़ नहीं सकटे   I32I

यही रहस्य इस दुनिया में,

समझ से बाहर रहता है ,

तुझको यही समझना होगा,

जो दाता तुझसे कहता है I33I

 कर्म किया किया है जिसने जैसा,

फल उसका निर्धारित है,

 कल का कर्म आज का भाग्य,

नियम यही संचालित है I34I

(बीता हुआ- कल -- कृपया ध्यान दें कर्म के बाद भाग्य है)

 जब-2  धर्म की होगी हानि,

अधर्म बढ़ाता अत्याचार ,

तय सीमा से आगे, अर्जुन

न बढ़ पायेगा अत्याचार I35I

इसे थामने की ताकत ,

तुम जैसे योद्धा करते हैं ,

तेरी ताकत के आगे , अर्जुन

नतमस्तक सब होते हैं  I36I

आत्मा ,अजर ,अमर

न कभी ये मरती है,

इसका काम खत्म होता,

नवजीवन धारण करती है I37I

कर्म करो बस कर्म करो,

फल की इच्छा कभी न करना,

जैसा तेरा कर्म होगा , अर्जुन

अनुरूप उसी के सबकुछ मिलना I38I

पाक साफ दिल से रहना ,

धर्म की खातिर आगे बढ़ना,

मिटेगा अधर्म ; होगा अर्जुन

प्रकाश पुञ्ज से जगत का खिलना I39I

कर्म का मिला अधिकार ,(तुझे )   ,

कर्म स्वयं ही करना है,

जैसे तेरे कर्म होगें , अर्जुन

अनुरूप उन्ही के भरना I40I

 देखो भीष्म पितामह को,

वचनबद्धता बनी कमजोरी ,
सिद्धान्त प्रिय हैं व्यक्ति महान,
चली ना इन की सीनाजोरी I41I

द्रुयों धन जैसा योद्धा बलशाली ,
शातिर दिमाग उसका चलता ,
कटु वचन उनसे कहता ,
नहीं किसी की चलने देताI42I

अर्जुन सबसे प्रिय हो तुम ,
असहाय हैरान हैं पितामह ,
नहीं चाहते युद्ध वे बिल्कुल,
ये होता बोलो किसकी शहI43I
शिक्षा जिनसे तुमने पाई ,
प्यार से तुम्हें सिखलाया ,
आज उन्हीं हाथों में देखो,
विरुद्ध तुम्हारे तरकश आयाI44I
भाई ! हां भाई है सारे तेरे अर्जुन ,
खून के प्यासे तेरे हैं ,
नहीं युद्ध धरा पे हो ,
ये बस में तेरे है.I45I
परिस्थिति बनी प्रतिकूल ]
सारे योद्धा फेल हुए ]
जो होना है वो होता है
इनमें कभी ना मेल हुए I46I
वही खून परिवार पुराना,
दुनिया जिनसे भय खाती ,
खून बना खून का दुश्मन,
किस्मत इसको सामने लातीI47I

परिस्थिति बनी प्रतिकूल,

 सारे योद्धा ! फ़ेल हुये ,

जो होना हैं वो होता है,

इनमें कभी ना मेल हुये

 I48I

सत्य झूठ दो भाई बन के,

मैदान युद्ध के आ डटे ,

इतना ताकतवर ना कोई ,

बिना लड़े ये हटे

I49I

यह भी सच है ,अर्जुन !,

जीत सत्य की तय है ,

अधर्म कभी ना सिर बोला ,

अल्पकाल इस का भय है

50

 सभी समझते इसको ,

युयुत्सु दुर्योधन है मजबूरी,
साथ चाहते हैं सब ,
पर पैदा की इस ने दूरी
51

मन करता और दिल चाहता ,
प्यार से मसले सुलझाएँ,
परिणाम हाथ से दूर हमारे ,
क्या होगा? हम क्या पाएँ ?
I52I
पुत्र प्रेम में डूबे इतने,
धृतराष्ट्र तुम्हारे अपने ,
जिन हाथों ने बचपन सींचा ,
टूट. गये अब सारे सपने
I53I
चिन्तित हैं वे भी ,!
परिणाम अदेंशा भय लाता ,
अर्जुन! तेरी ताकत के आगे,
घबराहट से दिल बैठा जाता
I54I
पुत्र मोह में इतनी लाचारी,
क्या दुनिया की कमजोरी ?
सभी विरासत चाहते हैं ,
सदा बढ़े ये तेरी मेरी I55I

शाकुनि बन के अधर्म ,
घर में चुपके  से आया,
सत्य न्याय की हरेक चाल पे ,
परचम अपना लहराया I56I

सभी जानते सभी समझते ,
नुकसान केवल अपना होना,
पता नहीं क्या मजबूरी
सोना अपने हाथ से खोना I57I
व्यक्ति बड़ा होता है
खून सभी का लाल.
सोच हमारी मानसिकता
अवरूद्ध करे बेडि़यां डाल
I58I
जीवन का मानक नहीं कभी ,
हीरे जवाहरात सोना है
मिलते खोते वक्त बीतता,
क्या इसके लिए रोना है!
I59I
आज जो मेरा है ,
कल तेरा बन जायेगा ,
किस्मत उसकी चलना है
छोड़ साथ वह जायेगा.
I60I

हंसी का पात्र बने हम सब
समझबूझ सब रखते हैं
श्मशानघाट  पे जा के देखो
जीवन का मर्म समझते हैं
I61I

धर्म का मार्ग न्यायकारी

अधर्म वेष बदलता है I

गुमराह करे ये चुपके से,

साथ धर्म के चलता है

I62I

 

कमजोरी कापुतला इंशा

कमजोरी  गुलाम  बनाती है I

नहीं चाहते करता वो ,

कमजोरी सदा सताती है I63I

 

ले के धर्म का नाम,

बढ़ता चलता अधर्म यहाँ ,

लहू का प्यासा जीवों का,

इसको कैसी शर्म यहाँ I64I

कमजोरी का फायदा ,

ले ता हुआ यहाँ खड़ा,

देख यहाँ मुस्काता,

भाई को भाई से लड़ा I65I

धर्म बनेगा कमजोर यहाँ ,

जब होगी धर्म की हानी,

इसकी रक्षा करने की ,

ताकत वीरों से आनी I66I

जरा चूक हुई, भूलहुई,

अधर्म पैर पसारे,

सदियों तक लड़ना होता  है,

कष्ट उठाते हैं सारे

I67I

सोच समझ की  शक्ति पंगु
अर्जुन रहा ढोल का ढोल ,
बार - बार माधव समझाते ,
निकलें बच्चों जैसे बोल
I68I
अर्जुन का भ्रम था , ये
या मोह में भूल गया सब,
घेरे से बाहर सोच जाये
अब, अर्जुन ! जानोगे तुम कब
I69I
तत्व  के मर्म जानो,
चिरस्थायी नहीं होता
करो कल्पना वक्त की
क्या देखा अपनों को रोता
 I70I
वक्त - वक्त की बात है
ये इन्तजार नहीं करता ,
फेरी वाला डेरा है ये ,
त्या सभी ये बढ़ता रहता
I71I
कितने आये और चले गये,
अब भी जाने को तैयार
क्रम में खड़े सभी है,
बारी का है इन्तजार
 I72I
याद रखो अर्जुन तुम,
करू ना करू में समझो फर्क,
निर्णय लेना सीखो तुम,
फालतू के रखो तर्क
 I73I

सीमा पे प्रहरी जगता है
और जन सारे सोते हैं
स्वयं झेलता दिक्कत वो
हंसते -हंसते रहते हैं 
I74I
निर्णय में चूक नहीं उन के,
दुश्मन उनसे थर्राता है,
तैयार है हरदम वो
दुश्मन उनसे घबराता है,
I75I
नमन है वीर सपूतों को ,
त्याग सदा है सर्वोपरि.
इनके कारण देश सुरक्षित,
नहीं है कोई इनसे ऊपर,
 I76I
धर्म का प्रतीक हो ,तुम पार्थ!,
अधर्म तुम्हें मिटाना है,
फल तेरी इच्छा के बाहर ,
पर इससे तुमको लड़ना है
I77I
जीना है तो ऐसे जियो ,
फक्र करे जमाना तुम पर,
मर भी जायें छोड़ सभी ,
इतिहास बहाये आंसू तुम पर,
 I78I
स्वर्ण अक्षर में नाम लिखें ,
गुणंगान करें सारा जमाना,
याद करें और आंसू निकले ,
पार्थ ! ऐसा नाम कमाना
I79I

पापी को हद में रखना,
अर्जुन !कन्धौ पे तेरे भार  है,
अधर्म मिटा सका सका ना तू ,
जीना तेरा धिक्कार हैं
I80I

ना कोई तेरा इस जहां में ,
अल्प समय का फेरा है,
अपना कार्य पूर्ण करो तुम ,
ये फेरी वाला डेरा है I81I

 

किस कारन ये मोह हुआ ,

समझ से मेरी बाहर है ,

रण क्षेत्र में इसी समय,

श्रेस्थ व्यवहार से बाहर है I82I

 

समय का समय पे ध्यान ,

बखां महापुरुष करते है,

धर्म की रक्षा हेतु ,

योद्धा युध क्षेत्र में जाते है I83I

 

इसी तरह से सोते रहोगे ,

देश धर्म सब खोते रहोगे ,

डर है तेरी कायरता ,

पार्थ I कब इसको समझोगे I84I

 

त्याग हृदय की दुर्बलता ,

गांडीव उठा ! तू आगे बढ़,

ना मर्दो का व्यवहार ना हो ,

चल युध क्षेत्र में आगे बढ़ I85I

 

 

हे माधव ! मन में संताप,

से बाहर जाता है,

गुरुदेव ,तात श्री ,पूजनीय,

अटूट मेरा नाता है

I86I

भीख माँगना है मंजूर,

खून हाथ से नहीं सने ,

अपनौ को मौत सुलाकर,

क्यों भोग विलाषी  हम बने 

I87I

आने वाला पल कैसा होगा,

मुझको ये तो ज्ञात नहीं ,

वे जीतेंगे, हम जीतेंगे,

सुब कुछ है अज्ञात यहीं 

I88I

 

माधव ! मैं हूँ शिष्य आपका,

ज्ञान की भिक्षा दिल से चाहता,

कलयाणकारी जो भी होगा,

मन से उसको करना चाहता

I89I

हरा भरा हो राज्य मेरा,

धनधान्य भरे भाण्डर रहें,

देवो जैसा शासन हो,

अविरल सुख की धारा बहे

I90I

मन की शांति  कोसों दूर,

भला क्या मैं  लड पायूँगा,

नहीं चाहिए मुझको कुछ,

अपनौ को सब दे जायूँगा

I91I

 अर्जुन इतना ना भोला बन ,

सीख जरा विद्वानों से ,
जो चले गये या जाने को हैं ,
शोक दूर रहे विद्वानों से
I92I
सत्य यही है ,अर्जुन
सदा रहा आसितत्व मेरा,
समय बदलता युग बीते ,
बदल सका ना आसितत्व मेरा
I93I
मोह शरीर का कभी ना करना,
शरीर बदलते रूप बदलते ,
आत्मा ,अजर ,अमर ,मौजूद सदा ,
जीवन मिलता जब हम मरते
I94I
तू क्या जाने ,तू क्या समझे ,
कितने जीवन तूने जिए ,
राजा हो रंक यहां ,
जीवन भोगे जन्म लिए 
I95I

बालपन के सुनहरे पल ,
नींद सुहानी लाये जवानी,
वृद्धावस्था पार किऐ,
मौत लिखती नई कहानी
I96I
सुख दुख इस जहां में ,
विषय संयोग भी रहते हैं ,
सृष्टि से जुड़े विषय विषयानतर,
सहन सभी हम करते हैं
I97I
मोक्ष योग्य वे पुरुष यहां,
समान झ्हें वे जानते ,
परछाई से व्याकुलता ,
मन से इनको मानते
I98I
अर्जुन !व्याकुल तेरा मन,
व्यथित रही तेरी मानवता ,
सबकुछ अपना दिखता है ,
नहीं किसी से दिल में कटुता
 I99I
र्निविकार मेरा जैसा बन जाओ,
जिसमें दुनिया तेरी समाय ,
                        सशंय को स्थान नही ,    (सबकुछ जिसमें तेरा हो )
सुख दुख एक समान ही जाय
I100I
दुर्योधन जैसा बन जाओ ,
लड़ता उस को रस मिलता ,
सही गलत को जाने वो ,
पर झूठ गलत में आनन्द बरसता
I101I

क्या उसके अपने रण क्षेत्र नहीं आये,
इन्तजार करता युद्ध शुरू होना ,
जीत मिलेगी राज करेगा ,
किस के िलए, क्यों रोना?
 I102I
मानव हो तुम !पार्थ,
सेतु बन के सम्बन्ध निभाते ,
मन का संशययुद्ध करो
या भाग क्यों नहीं जाते
 I103I

(आत्मा का वर्णन)

असत वस्तु की सत्ता ना,
सत का अभाव  नहीं रहता,
ज्ञानवान वे लोग यहाँ ,
मर्म तत्व मन में रहता
I104I

नाश रहित तू उसको जान,
जगत की माया जिनसे है ,
उस अविनाशी की माया है ,
सब कुछ रहता उनसे हैI
105I

नाशवान जगत है मिथ्या ,
आते जाते क्रम चलता,
कौन सदा यहां रहता है ,
सब तो पल -2 मिटता रहता
I106I

अजर, अमर, अविनाशी ,आत्मा ,
भूल करे, जो समझे मरता ,
ना ये मरता, ना ही मारता ,
रूप बदलता, चलता रहताI
107I

अजन्मा ,नित्यपुरातन, सनातन,
अदभुत ,अजीब, गजब कहानी ,
मौत रहती कौसों दूर,
रहस्य भरी बस यही कहानी
I108I

वस्त्र पुराना हो जाता,
नये को हम सब धाते हैं,
आत्मा त्यागे. मृत शरीर ,
नवजीवन हम पाते हैंI
109I

पानी पे तलवार चलाना ,
पानी को काट नहीं सके ,
शस्त्रों से ! परे आत्मा ,
आग इसे जला सकेI
110

जल की गलन. से दूर ,
वायु सुखा नहीं सकती ,
अच्छेद्य, अदाह्य ,अक्लेद्य ,अशोष्य ,
नित्य अचल स्थिर रहती
111

अव्यक्त ,अचिन्त्य, विकार-रहित ,
जीवन इसका सोच से परे ,
शोक के काबिल नहीं आत्मा ,
कहीं. कभी ना ये मरे I
112

लेती जन्म या मृत्यु प्राप्य,
क्रम इसका चलता रहता,
शोक के योग्य नहीं आत्मा.,
जीवन इसका सदा ही रहता I
113

 

जन्म मिला है जिसको ,
मृत्यु मिलन होना निशिचत,
मृत्यु मिली है जिसको ,
जीवन मिलना उसका निशिचत I
114
जन्म से पहले नहीं प्रगट,
मृत्यु अप्रगट कर देती है ,
जीवन रहता प्रगट यहां ,
आश्चर्य दिलों में भर देती हैI
115
ज्ञानी समझे इस का मर्म ,
अज्ञानी वने हंसी का पात्र ,
आश्चर्य भरा है तत्वों में ,
क्या अर्थ निकालें मात्र?
116
अवध्य ,आत्मा ,सर्वव्यापी ,
सनातन है प्रवित्त इसकी ,
भय से क्या लेना देना ,
अदभुत ,गजब प्रकृति इस कीI
117



अर्जुन, क्षत्रिय हो तुम!,
भाग युद्ध से जाओ',
धिक्कारेगी दुनिया सारी ,
माँ का दूध नहीं लजाओं.
118

धर्मयुद्ध छिड़ा है अब,
भाग्यवान बने हो तु ,
सौभाग्य मिला है तुमको ,
भय से कहाँ जाते हो तु
119

धर्मयुद्ध से मुँह मोड़ना ,
कीर्ति साथ नहीं देगी ,
स्वर्ग का द्वार दूर रहेगा ,
अपकीर्ति सदा तुम्हें मिलेगी 
120

सदियों तक अपकीर्ति का भागी,
शर्मनाक है बात यहाँ ,
इससे बेहतर मर जाना,
अप कथन कहेगा सारा जहाँ
121

सम्मान मिला लोगों से ,
लघुता तेरा हरण करेगी ,
भय के कारन अर्जुन !,
अपकीर्ति तेरा वरण करेगी 
122

क्षमता हीन, डरपोक,बुरा ,
अपयश शब्द नहीं रूकेगें ,
इससे बड़ा दुःख क्या ?,
लोगों की नजर में हम गिरेगें 
123

मृत्यु वरण कर लेगी,
स्वर्ग में तेरा स्वागत है ,
जीत मिली संग्राम में ,
धरा पे लेा तेरा स्वागत है
124

लाभ ,हानि ,जीवन ,मरण ,
यश, अपयश समान समझ ,
सुख- दुख ,जय -पराजय ,
असमान नहीं इन्हें समझI
125

कृष्ण ने कहा अर्जुन से !,
त्यागो भय ,देर ना कर,
महान योद्धा इस धरा का तू ,
तैयार रहो युद्ध कर
126

 “आज का कर्म भाग्य है कल

ज्ञान मिला है तुमको ,
जा कर्म में परिवर्तित कर,
 त्याग सभी बन्धन अब,
तैयार रहो युद्ध कर 
127
 बुद्धि हीन है पुरुष वे,
 मीठी वाणी से कहते ,
वे क्या रक्षा कर पायगे ,
भोग विलास में डूबे रहते
128
 अहंकार का प्रर्दशन ,
ऐश्वर्य ,कामना ,कमजोरी ,
बुद्धिहीन वे कर्महीन ,
जीवन जैसे किताब है कोरी
129
अप्राप्ति का प्राप्ति योग ,
प्राप्ति की रक्षा क्षेम कहें
,आसक्ति-हीन ,द्वन्दरहित ,
वेदों की वाणी यही कहें
130
योग बने  साध्य तेरा ,
साधन इसके  क्षमा योग्य!
कर्तव्य निभा ,प्रभुता पा ,
उत्तम ,सर्वोत्तम ,योग धारण:योग्य!
131
वर्षा होती, जल भरता! ,
पोखर जा सागर से मिले,
बनता ज्ञान का सागर विशाल ,
अथाह ज्ञान की लहर चले
131b
 तेरा नाता कर्म से है,
फल का मिलना भी तय् हैं,
 जैंसा तेरा कर्म रहेगा ,
अनुरूप उसी के मिलना भी तय् हैं:
 I132I
 फ़ल्  की इच्छा नहीं करो,
 फ़ल् की पहुँच हाथ से दूर,
आज का कर्म भाग्य है कल ,
मिलता सदा ना जाता दूर
I133I
 कर्म करें, सोचें जीत ,
जीत हार का वियोग यहाँ ,
हार सोचते जीत मिले,
हार का हार संयोग यहाँ
I134I


                                          अर्जुन, उठों धनुष को तान ,
धर्मयुद्ध का रख तू मान ,
 अधर्म का अंश मिटेगा,
 हिम्मत कर ,तू इसको जान
I135I
कंरु ना कंरू के फेरे में ,
उलझ ना तू गिर जायेगा ,
निर्णय तेरा मुशिकल होगा,
 अधर्म धरा  पे रह जायेगा
I136I
सोचो ! देखो! युद्ध यहाँ,
मान सम्मान जिन्होंने पाया,
कुछ तो अधर्म से जा मिले,
अंधेरा तन मन पे छाया
I137I
सम बुद्धि युक्त पुरूष बनो ,
पाप पुन्य को अब, त्यागो ,अर्जुन !,
समत्व स्वरूप है कर्मकुशलता,
 कर्म बन्धन से जागो ,अर्जुन !
I138I
समबुद्धि वाले पुरूष यहां,
बड़े वें भी ज्ञानी है ,
फ्लेच्छा -विहीन हैं. वे ,
पर हम सब अज्ञानी हैं
I139I

जिस दिन दलदल मोह रूप ,
अर्जुन !तुमने पार किया ,
लोक परलोक के भोगों से ,
समझो अपना उद्धार किया
I140I


वैराग्य मिलेगा, तुम को अर्जुन !,
निर्विकार परम पद को पाओगे ,
जीवन का मर्म मुठ्ठी में ,
तारण स्वयं को कर जाओगे
I141I

योद्धा का सम्मान दिलों में ,

जो अर्जुन तूने पाया ,

लोग सुनेंगे कायरता,

झूठ कहेंगे की माया I

142I

नहीं चूकते रहें विरोधी,

मौके की ताक में सदा रहेगें,

निन्दा करते नहीं थकेगें,

कटु वचन सदा कहेंगे I

143I

समत्व रहो कर्मों में तुम ,

सिद्धि असिद्धि एक समान ,

आसक्ति को त्यागो ,अर्जुन !,

यहीं छिपा तेरा सम्मानI

144I

 बुद्धि योग का आश्रय लों ,

फल को मुझपे छोड़ो ,

कर्म समझ ,कर्तव्य निभा ,

मोह से तुम नाता तोड़ो I

145I

कुछ तो अज्ञानी यहां ,

असत का राज बढ़ाते हैं ,

आढ़ में  लेते सत तत्व ,

लोगों को मूर्ख बनाते हैंI

146I

सबके अपने-2 कर्म,

सबकी अपनी बानी है ,

फ्लेच्छा में जीवित,

यही बात अज्ञानी है I

 147I

आगे इसके सुनो ,अर्जुन !,

तरह तरह नियम अपवाद सुने,

बुद्धि को भ्रमित करते ,

कुछ स्वयं को तारनहार बने 

I148I

सुन-2 के विचलित बुद्धि ,

कब तक ऐसा सहते रहोगे?,

अचल व स्थिर होगी जब ,

परमतत्व को प्राप्त करोगे I



                                             
                                            बुद्धि योग माध्यम तेरा,
 सत सदा करो सहन,
 संयोग तेरा सम्भव है,
 ईश्वर से जब होगा मिलन
150
 भ्रमित हुये अर्जुन ,थोड़ा,
 स्थिर बुद्धि समझ से परे ,
कैसे क्या लक्षण हैं ,
समझाओ इनको माधव मेरे,
151



जिज्ञासा मन में  देखी जब,
 अर्जुन पाला उत्तर की चाहत ,
माधव ने शुरू किया बताना ,
देखे अर्जुन पाते राहत ,
152
 मन हैं चंचल,मन हैं कोमल,
 फलेच्छा में जीता है ,
सन्तुष्टि  मिली,फलेच्छा गायब,
 स्थितप्रज्ञ वो हो जाता है,
153
फल से फर्क पडे ना  उसको,
जब जीवन में मिलता है ,
आत्मा इंशा काया में ,
सन्तुष्ट सदा वो रहता है
154------


स्थिर बुद्धि उस मानव में ,
मन में उद्वेग नहीं दुख में,
 राग ,भय, क्रोध, रफूचक्कर ,
सर्वदा निस्पृह रहता सुख में ,
155
अनन्त कामना लेके जीता ,
स्नेह रहित मुशि कल से होता ,
फितरत जीवन की ऐसी है ,
पाने को हरदम रोता
156
स्थिर बुद्धि होती उसकी
शुभ अशुभ में फर्क पडे  नहीं
विषयों से वो दूर रहे,
 आगे इसके तर्क नहीं ,
157
समेटे अपने अंग -2,
सीख उसे कच्छप देता,
 इन्द्रियाँ रहे विषयों से दूर,
 वो वश में कर लेता ,
158
इन्द्रियों से दूरी कुछ में,
 पूर्ण निर्वृत्त ना होती उनमें ,
आसक्ति जीवत रहती ,
प्रवृत्ति नहीं बदलती उनमें ,
159
स्थितप्रज्ञ पुरुष को देखो ,
परम तत्व में आसक्ति है ,
परमपिता से होगा मिलन ,
निर्वृत्त करती आसक्ति है ,
160

बलात पुरूष के मन को ,
आसक्ति में बढ़ते देखा ,
बुद्धिमान भी हारे इनसे ,
शिखर पे चढ़ते गिरते देखा ,
161
समाहितचित्त में साधक,
 इन्द्रियां बस में कर लेता, है
 ध्यान ज्ञान केन्द्रित उसमें
बुद्धि स्थिर कर लेता है
162
आसक्ति, विषय विषमायान्तर,
 कामना पैदा करता चिन्तन ,
विध्न करे बर्दाश्त से बाहर ,
क्रोध तोड़ता तन मन
163
मूढ़ भाव देता है क्रोध ,
भ्रमित होती बुद्धि हमारी ,
ज्ञान शक्ति निर्णय क्षरण
क्रोध मिटाता शक्ति हमारी
164
बुद्धि नाश् मानव पतन ,
पशु समान बन जाता है ,
राग द्वेष आसक्ति में लीन,
 गर्त में व्यक्ति गिर जाता है ,
165
आधीन रखा जिसने इनको ,
राग द्वेष से प्रभाव नहीं ,
अन्तःकरण है साफ स्वच्छ ,
उनका कोईं जबाव नहीं
166
खिलता रहता अन्तःकरण,
फर्क नहीं दुख या विपदा,
ईश भक्ति में गहन लीन,
स्थिर रहता सदा सर्वदा
167




मन के के हारे हार है ,
मन के जीते जीत,”(Taken from outside)
 आसक्ति लीन हैं वो ,
विषयों में में रखता प्रीत
168
 अन्तःकरण भावना शून्य ,
शान्ति कभी ना मिलती ,
सदा लालसा रहती मन में
सुख की घड़ियां कभी ना चलती ,
169,
जल में चलती नाव ,
पतवारों को रोके वेग,
 प्रभाव ऐसा इनिद्रयों का ,
हार लेती ही हैं बुद्धि वेग
170
स्थिर बुद्धि उसी की है ,
काबिज कभी नहीं होती,
 मन को केन्द्रित करें ,
प्रभु भक्ति में ले जाती ,
171
सुख संसारिक पाने  की होड़ ,
नाशवान समझते जन ,
दिन रात खुशी में बीते,
 यही चाहते जन-मन
172
योगी का ध्यान वहाँ ,
जो परम तत्व का साधन हो ,
सुख है रात्रि समान जिन्है ,
नहीं किसी का बन्धन हो,

173
 नदी का मिलन ,
जब सागर से हो जाता है ,
नदी विलीन होगी उसमें,
 सागर ना विचलित  होता है
174
परमशान्ति लिंगन करती,
योग करे ना कोई विकार ,
परमतत्व में विलीन हो तो,
देती बुद्धि इस को नकार
175

त्याग ,कामना ,तमन्ना रहित ,
ममता ,,अहंकार रहित ,
परम  शान्ति आलिं गन करती ,
रहे सर्वदा विकार रहित
176,
ब्रह्म में स्थित पुरुष वही,
योगी कभी ना मोहित होता ,
ब्रह्म स्थिति सदा सामने ,
ब्रह्मानन्द को प्राप्त होता ,
177
ब्रह्मानन्द है परमानन्द ,
आनन्द की असीम सीमा
जीते मरते जाना जिसने ,
मर्म जीवन का समझा उसने
178
जनसामान्य की समझ पहुँच से दूर ,
मूर्ख बनते हंसी का पात्र ,
थोथी बातों में जीते जीवन,
बनता नियम उनका मात्र
179
(ञृणी कृष्णा के जीवन मरते ,
शब्द बने माध्यम हमसे ,
भला हो सबका ,
यही रहे दुआ दिल से ,
180
कृपा बरसे माधव की ,
सब के काम बने सुबह साम,
हंसी खुशी से गुजरे जिन्दगी
सबको मिले प्रेम- शान्ति (का) मुकाम)
181
द्वितीय अध्याय  समाप्त
जय हो कृष्णा

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 RajArchna


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